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सचिन वझे पहले पुलिस अधिकारी नहीं, मुंबई पुलिस पर दाग लगाते रहे हैं उसके ही अफसर

मुकेश अंबानी मामले में सचिन वझे (Sachin Waze) ने मुंबई पुलिस (Mumbai Police)की छवि को दागदार किया है लेकिन ये पहला मामला नहीं है बल्कि इससे पहले भी मुंबई पुलिस के कई अफसर इसी तरह की शर्मनाक हरकत करते आये हैं।

मुंबई, ओमप्रकाश तिवारी। पिछले वर्ष सिने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मौत के बाद जब सुशांत के पिता ने बिहार में अपनी एफआईआर दर्ज कराई और मीडिया भी इस मामले को जमकर तूल देने लगा, तो मुंबई पुलिस के कुछ सेवानिवृत आईपीएस अधिकारियों ने मुंबई उच्चन्यायालय में याचिका दायर कर इस मुद्दे पर मीडिया ट्रायल रुकवाने की मांग की थी। सत्तारूढ़ शिवसेना ने भी इसे महाराष्ट्र की अस्मिता का मुद्दा बनाते हुए मुंबई पुलिस का अपमान करार दिया था। महाराष्ट्र के किसी भी मामले में केंद्रीय एजेंसियों के हस्तक्षेप को महाराष्ट्र की अस्मिता से जोड़कर देखना शिवसेना की आदत रही है। इससे उसका मराठी वोटबैंक मजबूत होता है। लेकिन अब मुंबई पुलिस के ही एक सहायक इंस्पेक्टर की करतूतों ने शिवसेना सहित महाराष्ट्र की पूरी सरकार को बचाव की मुद्रा में ला दिया है।

 सचिन वझे पहले पुलिस अधिकारी नहीं हैं, जिनके कारण मुंबई पुलिस की छवि पर दाग लगा हो। इसमें कोई शक नहीं कि मुंबई पुलिस काफी कर्मठ एवं सक्षम पुलिस बल है। इसकी कार्यप्रणाली का ही कमाल है कि मुंबई की कामकाजी महिलाएं रात को अंतिम लोकल ट्रेन से भी उतरकर बैखोफ अपने घर जाती देखी जा सकती हैं। लेकिन मुंबई पुलिस का दूसरा चेहरा भी गाहे-बगाहे सामने आता रहा है। मुंबई पुलिस का ये चेहरा मुंबई के पहले एनकाउंटर से ही सामने आने लगा था। जिसमें एसीपी इसाक बागवान ने मान्या सुर्वे नामक गैंगस्टर का एनकाउंटर किया था। बताया जाता है कि  11 जनवरी, 1982 को हुए इस एनकाउंटर का सेहरा तो बागवान के सिर पर बंधा था, लेकिन मान्या सुर्वे मरा छोटा राजन की गोली से था। इस एनकाउंटर के समय छोटा राजन खुद बागवान के साथ था। 

अंडरवर्ल्ड से पुलिस की नजदीकी 

इस घटना पर 2013 में एक फिल्म ‘शूट आउट एट वडाला’बन चुकी है। इसके अलावा ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’ की असली कहानी में भी एक आईपीएस ए.ए.खान द्वारा माफिया सरगना दाऊद इब्राहिम की टिप पर माया डोलस एवं उसके साथियों को मारे जाने की बात कही जाती है। अंडरवर्ल्ड से पुलिस की नजदीकी यहीं तक सीमित नहीं रही। 1992 से 2002 तक मुंबई में सक्रिय रहे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इंस्पेक्टरों पर अक्सर एक गैंग से हाथ मिलाकर दूसरे गैंग का सफाया करने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे ही एक इंस्पेक्टर प्रदीप शर्मा की क्राइम इंटेलीजेंस यूनिट टीम में सचिन वझे भी शामिल रहे हैं। उसी दौरान दुबई से आए एक कंप्यूटर इंजीनियर ख्वाजा यूनुस की पुलिस हिरासत में हुई मौत के मामले में वझे को न सिर्फ उच्चन्यायालय के आदेश पर निलंबित किया गया था, बल्कि उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। बाद में वह नौकरी से खुद इस्तीफा देकर शिवसेना में शामिल हो गया था। उसके गुरु प्रदीप शर्मा भी शिवसेना में शामिल होकर पिछला विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। कभी प्रदीप शर्मा के साथ रहे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट दया नायक एवं एक अन्य एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रवींद्र आंग्रे को भी विभिन्न आरोपों में जेल जाना पड़ चुका है।

फर्जी एनकाउंटर मामलों में प्रदीप शर्मा पर भी काफी उंगलियां उठती रही हैं। मुंबई के लखन भैया फर्जी एनकाउंटर मामले में उन्हें जेल भी जाना पड़ा है। लेकिन फैसला आने पर वह स्वयं बरी हो गए थे, लेकिन इस मामले में 13 पुलिसकर्मियों को कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। 2006 में हुए इस मामले में जिस व्यक्ति को खूंखार गुंडा बताकर मार दिया गया था। उसके भाई ने लखन भैया की गिरफ्तारी के तुरंत बाद पुलिस आयुक्त को भेजे गए फैक्स और टेलीग्राम प्रस्तुत करते हुए सिद्ध कर दिया था कि यह एनकाउंटर फर्जी था। मुंबई के बहुचर्चित तेलगी कांड (स्टैंप घोटाले) में भी मुंबई पुलिस के कई आला अफसरों को जेल की हवा खानी पड़ी थी। उस समय मुंबई पुलिस के आयुक्त रहे रंजीत शर्मा 31 दिसंबर तक अपनी सेवा में रहे, और एक जनवरी को सेवानिवृत्त होते ही उन्हें जेल जाना पड़ा था। इसी मामले में संयुक्त पुलिस आयुक्त श्रीधर वगल एवं बहुत प्रभावशाली समझे जानेवाले पुलिस उपायुक्त प्रदीप सावंत को भी जेल की हवा खानी पड़ी थी।

एक सीनियर इंस्पेक्टर असलम मोमिन को दाऊद गिरोह से संपर्क रखने के कारण बर्खास्त होना पड़ा था। जब दाऊद का भाई इकबाल कास्कर प्रत्यर्पित होकर भारत लाया जाना था, तो मोमिन की एक टेलीफोनिक बातचीत रिकार्ड की गई थी, जिसमें वह यह कहता सुना गया था कि इकबाल को भारत आने दो, मैं सब इंतजाम देख लूंगा। मुंबई पुलिस के उच्च अधिकारियों के अंडरवर्ल्ड से संबंध का सिलसिला अभी भी थमा नहीं है। लेकिन उन्हें सरकारी संरक्षण भी मिलता जा रहा है। राज्य में शिवसेनानीत सरकार आने के बाद मुंबई में एटीएस प्रमुख रह चुके एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की जांच करने की जिम्मेदारी महानिदेशक होमगार्ड वरिष्ठ आईपीएस संजय पांडे को सौंपी गई थी। अपनी जांच के दौरान वह आर्थर रोड जेल एवं तलोजा जेल में बंद अंडरवर्ल्ड के कई लोगों के बयान दर्ज कर अपनी रिपोर्ट दो बार गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को सौंप चुके हैं। लेकिन संदिग्ध पुलिस अधिकारी पर आगे की कार्रवाई करने की हिम्मत सरकार अभी नहीं जुटा सकी है। Source : Jagran

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