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हाथी पर सवार होकर बेलछी पहुंची थीं इंदिरा गांधी, जहां नरसंहार में जिंदा जला दिए गए थे कई दलित

बिहार चुनाव-2020 का बिगुल बज चुका है. गठबंधन के जोड़ तोड़ के बीच अतीत-वर्तमान हर तरीके से वोट बैंक साधे जा रहे हैं. कभी नरसंघारों से लाल होती रही बिहार की धरती पर बेलछी का जिक्र भी किसी न किसी बहाने आ ही जाता है. इंदिरा गांधी का बेलछी जाना आज भी मिथक को तोड़ने वाला माना जाता है.

1977 में इंदिरा गांधी केंद्र की सत्ता से बेदखल हो चुकी थीं. देश में जनता पार्टी की सरकार थी. मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री थे. सरकार तकरीबन 9 महीने चल चुकी थी. बिहार विधानसभा के चुनाव होने वाले थे. इससे कुछ दिन पहले ही हथियारों से लैस कुर्मियों के गिरोह ने बेलछी गांव पर हमला बोल दिया. घंटों गोलियां चलीं. 11 लोगों को जिंदा जला दिया गया. एक 14 साल के लड़के ने आग से निकलने की कोशिश की तो उसे उठाकर फिर आग में झोंक दिया गया. उसकी चीखें आग की लपटों में दफन हो गईं. मरने वालों में 8 पासवान और 3 सुनार थे. घटना जंगल में आग की तरह फैली. जब इंदिरा गांधी को इसका पता चला तो वह दिल्ली में अपने घर पर थीं. उन्होंने तुरंत बेलछी जाने का फैसला कर लिया. उनके साथ प्रतिभा सिंह पाटिल भी थीं जो बाद में भारत की राष्ट्रपति बनीं.
 
आपातकाल से निकले गुस्से से राजनीति के हाशिए पर धकेल दी गईं इंदिरा गांधी ने ताड़ लिया था कि बेलछी की घटना देश ही नहीं दूसरे देशों का भी ध्यान जरूर खींचेगी. जब उन्होंने बेलछी जाने की बात की तो सोनिया गांधी ने कहा कि सुना है कि बिहार बहुत खराब जगह है. सुरक्षा की लिहाज से आपको वहां नहीं जाना चाहिए. लेकिन इंदिरा ने उन्हें समझाया कि ऐसा मानना ठीक नहीं है. सोनिया गांधी के बायोग्राफर जविएर मोरो ने अपनी किताब ‘दी रेड साड़ी’ में इस घटना को विस्तार से बताया है.

तेज बारिश बन गई बाधा

वो लिखते हैं कि 13 अगस्त 1977 को तेज बारिश हो रही थी. इंदिरा गांधी पटना तक फ्लाइट से पहुंचीं. इसके बाद कार से बेलछी के लिए निकल लीं. कार कुछ दूर ही चल सकी क्योंकि कीचड़ की वजह से आगे जाना मुश्किल था. इसके बाद ट्रैक्टर का सहारा लिया गया. साथ चल रहे लोगों ने कहा कि मौसम को देखते हुए कार्यक्रम स्थगित कर दिया जाना चाहिए. लेकिन इंदिरा गांधी अपने फैसले पर अड़ी रहीं. क्योंकि उन्हें पता था कि अगर वह चलेंगी तो कार्यकर्ता भी आगे बढ़ेंगे. इसके बाद आगे नदी थी. नदी पार करने के लिए हाथी का इंतजाम किया गया जिसका नाम मोती था. हाथी पर बैठने के लिए हौदा नहीं था लेकिन इंदिरा ऐसे ही बैठने को तैयार हो गईं. महावत के बाद इंदिरा गांधी बैठीं और पीछे प्रतिभा सिंह पाटिल इंदिरा गांधी अंधेरे में नदी पार कर वह बेलछी पहुंचीं.

उन्होंने लिखा है कि प्रतिभा एकदम डरी हुई उनकी साड़ी का पल्लू पकड़कर बैठी थीं. एक जगह पानी कमर तक आ गया था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानीं. जब वह बेलछी पहुंचीं तो गांववालों को ऐसा लगा कि कोई देवदूत आया है. किसी पूर्व प्रधानमंत्री का लोगों के आंसू पोंछने के लिए गांव में पहुंचना उस समय ही नहीं आज भी बड़ी बात है. इंदिरा गांधी ने बताया था कि लोगों ने उन्हें भीगे कपड़े पहने देखा तो नई साड़ी दी. खाने को मिठाई दी. लोगों ने उनसे यह भी कहा कि आपको वोट न देकर गलती की. इंदिरा गांधी जब दिल्ली लौटीं तो उनके चेहरे पर चमक थी. हाथी पर सवार इंदिरा गांधी कि फोटो ने तब देश ही नहीं अतरर्राष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान खींचा था.  

क्यों बेलछी को हाथरस से जोड़कर देखना वाजिब है?

हाथरस में जाने के राहुल और प्रियंका के संघर्ष को इंदिरा के बेलछी जाने से जोड़कर देखा जा रहा है. इस पर पटना के वरिष्ठ पत्रकार राहुल कहते हैं कि बेलछी से इसकी तुलना नहीं की जा सकती. अगर प्रियंका-राहुल पहले ही दिन किसी भी दम पर वहां पहुंचने की कोशिश करते तो कुछ हद तक यह माना भा जा सकता था लेकिन दोनों उस दिन दिल्ली लौट गए थे. योगी ने पहले डीजीपी को वहां भेजा, सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी इसके बाद इन लोगों को जाने की अनुमति दे दी. बिना कार्यकर्ताओं के किसी नेता का ऐसी जगह पर जाना माहौल नहीं बना पाता फिर आप मीडिया पर निर्भर हो जाते हैं कि आपको कितनी कवरेज मिलती है. हालांकि कोरोना के समय में प्रियंका का पीड़िता को गले लगाकर सांत्वना देना लोगों का ध्यान जरूर खींचेगा. प्रियंका और राहुल ने इतना तो कर ही दिया है कि दूसरे दल पीड़िता के परिवार से मिलने का प्रोग्राम बना रहे हैं. योगी सरकार भी हठ छोड़कर नरम पड़ी है. यह भी बड़ी उपलब्धि है.

दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात कि उस समय इंदिरा गांधी का प्रशासन के स्तर पर कोई विरोध नहीं किया गया था. कर्पूरी ठाकुर उस समय बिहार के मुख्यमंत्री थे और अगर इंदिरा उनसे कहतीं या कांग्रेस का कोई नेता उनसे कहता तो वह खुद उनके जाने की व्यवस्था करा देते. तब का जमाना और था, लोग और थे. इस घटना ने पूरे देश के कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया और 1980 में कांग्रेस ने केंद्र में जोरदार वापसी की.

क्या हुआ था बेलछी में?

राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने अखबार का संपादक रहने के दौरान बेलछी का दौरा किया था और बताया था कि आखिर उस दिन हुआ क्या था. कुर्मी महावीर महतो और हरिजन सिंधवा पहले साथ-साथ थे. सिंधवा नालंदा का अपना पुश्तैनी मकान छोड़कर बेलछी में अपनी ससुराल में रहने लगा था. कुर्मी महावीर महतो दबंग था और आसपास के गांवों में कुर्मी जोतदारों की वजह से उसको मदद मिलती थी. महावीर गरीब हरिजनों की जमीनों पर भी कब्जा करने से बाज नहीं आता था जिसका सिंधवा विरोध करता था. सिंधवा ने हरिजन-दुषाधों को इकट्ठा किया और महावीर के खिलाफ बिगूल फूंक दिया. सिंधवा ने प्रतिज्ञा ली कि महावीर को गांव में नहीं घुसने देगा और किसी की फसल नहीं लूटने देगा. बस यहीं से यह लड़ाई कुर्मियों बनाम हरिजनों की हो गई. इसी बीच महावीर के एक आदमी की हत्या हो गई. 27 दिन बाद उसकी लाश मिली थी. इसके बाद आसपास के दबंग कुर्मियों ने हरिजनों को सबक सिखाने का फैसला किया.

बेलछी पर पहले हमला किया गया लेकिन सिंधवा के गिरोह ने उन्हें खदेड़ दिया. इसके बाद महावीर महतो के घर से दूसरा गिरोह निकला. पूरे दिन गोलियां चलीं. सिंधवा के लोगों ने रोहन महतो के घर में शरण ली. पूरे दिन दोनों तरफ से गोलियां चलती रहीं. 11 बजे दिन से शाम 5 बजे तक युद्ध चला लेकिन न प्रशासन को खबर लगी न पुलिस को या तो जानकर भी वो अनजान बने रहे. धोखे से सिंधवा और उसके लोगों को घर से बाहर निकाला गया. फिर सबके हाथ बांध दिए गए. फिर जुलूस की शक्ल में सबको गांव के बाहर ले जाया गया. वहां लगभग 400 लोगों के सामने इन लोगों को गोली मारकर आग में झोंक दिया गया. 14 साल के एक बालक राजाराम ने आग से निकलने की कोशिश की तो उसे फिर से उठाकर आग में फेंक दिया गया. जिस रोहन महतो के घर में इन लोगों ने शरण ली थी. उन्हें इन लोगों ने शरण ली थी उन्हें सजातीय होने की वजह से छोड़ दिया गया.

हरिवंश लिखते हैं कि बिहार को अभी आने वाले दो दशकों में भीषण खूनी और जातीय संघर्ष का गवाह बनना था. इसकी नींव बेलछी में रख दी गई थी. 1980 में इस मामले में फैसला आया था. इस मामले में महावीर महतो समेत 2 को फांसी और 15 लोगों को आजीवन करावास की सजा सुनाई गई थी. पत्रकार राहुल बताते हैं कि बेलछी के नरसंहार ने बिहार के माथे को वह कलंक दिया जिसे मिटाने में दशकों लग गए. यहीं से बिहार में नरसंघार का दौर शुरू हुआ जिसने प्रशासन को पंगु और बहुतों को बेसहारा कर दिया. बेलछी हरनौत विधानसभा में आता है जहां से नीतीश कुमार कई बार विधायक रहे. हालांकि 1977 में वह चुनाव हार गए थे.

Input : Aaj Tak

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