सुमित्रा देवी ने सड़कों पर झाड़ू लगाकर 3 बच्चों को पढ़ाया, सेवानिवृत्त होने पर डॉक्टर, इंजीनियर और आईएएस अधिकारी बनकर पहुंचे तीनों बेटे

आज के युग में माता पिता अपने बच्चे को अच्छी परवरिश देने के अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। अपनी इच्छाओं को त्याग कर अपनी सारी पूंजी बच्चों के पीछे खर्च कर देते हैं , ताकि उनके बच्चे जीवन में सफल हो सके । यह खबर ऐसी ही एक सच्ची कहानी है। इस कहानी में एक विधवा महिला सफाई कर्मी के तौर पर काम कर अपने तीन बच्चों की भलीभांति परवरिश कर उन्हें सफलता के मुकाम तक पहुंचाया।

सफाई कर्मी के रूप में काम कर रही इस महिला का नाम सुमित्रा देवी है जो झारखंड के एक छोटे से गांव रजरप्पा की रहने वाली है। सफाई कर्मी का काम कर वह जो पैसा कमाती थी, वह बच्चों की पढ़ाई एवं परवरिश में खर्च कर देती थी। इधर बच्चों ने भी घर की आर्थिक स्थिति को समझते हुए मन लगाकर पढ़ाई की और आज एक बेटा जिला अधिकारी, दूसरा एमबीबीएस डॉक्टर और तीसरा बेटा इंजीनियर बन कर अपने परिवार का नाम रौशन कर रहा है। बच्चों की सफलता देखकर उनकी मां भी गर्व महसूस कर रही हैं।


आइए जानते हैं सुमित्रा देवी के बारे में
सुमित्रा देवी झारखंड के छोटे से गांव रजरप्पा की रहने वाली है, जिनका विवाह बहुत कम उम्र में ही हो गया था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति भी ज्यादा मजबूत न थी। इसी बीच काफी वर्ष पहले उनके पति का निधन हो गया। इसके कारण अचानक पूरे घर की जिम्मेवारी सुमित्रा देवी के कंधों पर आ गई। सुमित्रा पढ़ी-लिखी नहीं थी ,लेकिन अपने बच्चों को पढ़ा कर वह बड़ा अधिकारी बनाना चाहती थी। बच्चों की अच्छी परवरिश और अच्छी पढ़ाई के लिए उन्होंने नौकरी तलाशना शुरू कर दिया ।अनपढ़ होने के कारण नौकरी मिलने में उन्हें बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा।

एक साक्षात्कार के माध्यम से उन्होंने बताया था की पढ़ी लिखी ना होने के कारण उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है। उन्हें नौकरी पर रखने को कोई भी तैयार नहीं हो रहा था। बहुत परिश्रम के बाद उन्हें नगरपालिका के तहत् इलाके में सफाई के काम पर रखा गया था। शुरू के दिनों में कुछ वर्षो तक वह ठेकेदार के अन्दर रहकर सफाई का काम करती थी। फिर उन्हें नगरपालिका के तरफ से रख लिया गया । अर्थात् उनके सफाई कर्मी की नौकरी पक्की हो गई। इस दौरान उन्होंने बताया कि इस काम को करने के लिए वह सुबह जल्दी उठकर बच्चों के लिए खाना तैयार करती थी , इसके बाद जब उनके बच्चे स्कूल चले जाते थे तब वह नगर पालिका द्वारा चुने हुए जगह पर झाड़ू लगाने जाती थी । आर्थिक तंगी के कारण उन्हें अपनी इच्छाओं को प्रायः दबाकर बच्चों की जरूरतों पर ध्यान देना पड़ता था।

इधर, बच्चों की परवरिश और पढ़ाई को लेकर जितनी मेहनत सुमित्रा देवी कर रही थी, मां के सपनों को पूरा करने में बच्चों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। पैसों के अभाव और सीमित संसाधनों के बीच दिन रात बच्चों ने भी मेहनत और लगन से पढ़ाई की। बच्चों ने भी खूब परिश्रम कर खूब सफलता हासिल की। सबसे पहले बड़े बेटे ने सफलता हासिल की। उनके बड़े बेटे का नाम वीरेंद्र कुमार है वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रेलवे विभाग में सरकारी इंजीनियर के पद पर सेवा दे रहे हैं, वही सुमित्रा देवी का दूसरा बेटा जिनका नाम धीरेंद्र कुमार है वह एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर डॉक्टर बन गए एवं वही सुमित्रा देवी के सबसे छोटे बेटे महेंद्र कुमार ने यूपीएससी परीक्षा की तैयारी हैं, इस परीक्षा में उन्होंने अच्छी रैंक हासिल की, अच्छी रैंक पाने के कारण उनका आईएएस के पद पर सिलेक्शन हो गया। वर्तमान समय में वह बिहार के सुपौल जिले में जिला अधिकारी के पद पर बने हुए हैं और अपनी सेवा दे रहे हैं।

बच्चों को सफल बना कर सुमित्रा देवी अब सफाई कर्मी की नौकरी छोड़ दी है। नगर पालिका द्वारा उनके सेवानिवृत्ति होने पर उन्हें सम्मानित किया गया। इस दौरान जिस समय उन्हें सम्मानित किया जा रहा था उस समय उनके तीनों बेटे मां की खुशी में शामिल हुए। वही सुमित्रा के साथ काम करने वाले कर्मी उनकी लग्न और सफलता देखकर चकित रह गए। जिस तरह से सुमित्रा देवी अकेली और सफाई कर्मी होने के बावजूद अपने बच्चों को इस ऊंचाई तक पहुंचाई , यह कोई छोटी बात नही थी।

इस सेवानिवृत्ति के दौरान उपस्थित उनके सबसे छोटे आईएएस महेंद्र ने बताया कि उनकी मां ने बहुत परिश्रम कर तीनों बच्चों को काबिल बनाया है। यह मां की मेहनत और आशीर्वाद का फल है जो हम अपने पैरों पर खड़े हो सकें। वही कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता , मां की मेहनत हमारे लिए प्रेरणा रहेगी।

Supriya Sahay

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